पेंड़ हमारी जिन्दगियों में एक किरदार की तरह हैं। कभी इन्हे मान्यताओ में देखा जाता तो, कभी ये लोगो की जिन्दगियों में बदलते चेहरे लिये उतरते हैं, एक बैठक वाली जगह जहां तसल्ली से कुछ देर बैठ गुफतगु की जाती हैं, गर्मियों में वो जगह बन जाती हैं जहां घर के कपड़े सुखाने के लिये रस्सीयां बांध दी जाती हैं। वो जगह जो किसी के लिये सकुन कि जगह बनती हैं तो किसी के लिये गुफतगु कि, तो कोई पेड़ो को अपने रोज़ाना के कामो में ढाल लेता हैं। पर इनके आस पास एक महफिल नुमा हजुम हमेशा देखा जाता हैं। हम अपनी मान्यताओं के साथ आज भी त्यौहारो में इनके आस-पास एक महफिल सजाये दिखते हैं, त्यौहारो में इन पर चढ़ावा, जल चढ़ा कर जैसे इन्हे खुबसुरत बना देते हो, सावन के दिनो में लोग इन पर झुले डाल इसके आस-पास खेलते-कुदते दिखाई देते हैं। ये जगह ही वो हैं जो अनगिनत चहरो के बदलाव के साथ हमारी बीच हमेशा दिखती हैं। आज ये पेड़ किसी जगह में सिर्फ मन्नतो का पेड़ नही हैं। बल्की आज ये लोगो के बीच हर मोड़ पर बदल जाने वाले उन चेहरो की तरह हैं जो एक जगह बनाता हैं। और ये जगह हमेशा हम सबके बीच एक न्यौते में होती हैं।
Thursday, July 28, 2011
Sunday, June 19, 2011
जगह
अक्सर ही वहां किसी ना किसी जाने-पहचाने कुछ आन्जानो की आवाज़ सुनाई देती। जैसे कभी बच्चो कि तो कभी औरतो कि, उनकी इस आवाज़ से में परेशान हो सोचने लगी कि "क्या इन्हे कही ओर जगह नही मिलती"। ये सब घर के नीचे बैठकर ही इतनी आवाज़ करती रहती हैं। पर न जाने उनकी आवाज़ और उनकी बातो में कैसा जादु हैं कि उनकी बाते मुझे उनकी तरफ आकर्षित कर ही लेती हैं। कभी तो वो अपने बच्चो की तो कभी खुद की बाते करती। उनकी इस बात से में उनकी तरफ आकर्षित हो जाती। और उनके साथ बैठ जाती। उनकी बाते सुनकर मेरा टाईम भी पास हो जाता। मगर जिस दिन वो नही आते तो पुरे दिन निगाहे उनका इन्तेजार करती। और बेसबरो की तरह नीचे जाने कि सोचती रहती। सोचती वो सभी जल्दी से आ जाये। जगह हर बार एक सी नही होती। जगह बदलती रहती हैं।
प्रतीक
Friday, June 17, 2011
खास जगह...
जगह कुछ एसी बन जाती हैं जिनसे हमारा ताल्लुक जुड़ जाता हैं। रोज़ कि इस भागती दौड़ती इ जिन्दगी में बहुत कम लोग जगह पर ध्यान दे पाते हैं, कभी कभी तो एसा लगता काम करके कुछ ज्यादा ही थकावट हो जाती तो थकावट के कारण मैं एक जगह टिक कर बैठ जाती लेकिन कभी नही सोचा था कि जगहो से रिश्ते भी जुड़ जाते हैं।
एक बार मेरे नाना के दोस्त आलम भाई साहब घर आये और घर के दाये तरफ के पलंग पर बैठ गये और नज़म गाने लगे। पहले तो किसी ने इस बात पर गौर ही नही किया। लेकिन जब वो रोज़ अकर नज़म गाते तो सभी बड़े ही चाव से सुनते और उनकी तारिफ करते। हम सभी लोगो को उनकि गाई हुई नज़म बहुत ही अच्छी लगती हर शाम हम उनका और उनकी नज़म का इन्ते जार करते। वो भी आतते ही अपनी नज़म गुनगुनाने लगते। सुनकर सभी यह कहते कि उनकी आवाज़ में जादु हैं जो उनकी नज़म सुनने के लिये हमे बैचेन करता हैं। मैं रोज़ उनका जलपान भी अच्छे से कराती तो वो मुझे दुआये देते। उन्होने सभी का दिल जीत लिया था। पर एक दिन एसा आया कि हम उसी जगह पलंग बिछा कर उनका इन्तेजार करते रह गये मगर वो आये ही नही। हम सभी कि नज़र उसी जगह गड़ी रही रहती। लेकिन शाम से रात हो गई चार दिनो तक वो नही आये। सभी उना चेहरा तक नही देख पा रहे थे। हरपल उनका इन्तेजार सा रहता। मैं भी मन ही मन सोचती रहती थी कि वे कब आयेंगे। और उनकी नज़म हमे सुनने को मिलेगी। पड़ोसी भी आते और पुछते कि आलम भाई साहब का कोई समाचार मिला कि वे कब आ रहे हैं। जिस जगह वो आकर बैठते वो जगह तो हमारे लिये खास बन चुकि थी। एक अजीब सा रिश्ता जुड़ गया था। जब तह सब जाना तो लगा सचमुच जगह से भी यादे जुड़ जाती हैं वह जगह अपनी सी लगने लगती हैं। वैसे ही उस जगह की याद ने उस जगह को मेरे और आसपास वालो लिये खास बना दिया था।
काजोल
काजोल
Tuesday, May 24, 2011
राज जो चुप्पी लिए हुए था
दोपहर का समय होगा। सूरज सिर पर था। पीठ पर स्कूल का बैग टाँगे, हाथों में पानी की बोतल लिए, एक जैसे कपड़े पहने आपस में बातें करते हुइ दो नन्हे साथी अपने स्कूल के रास्ते को आँक रहे थे। चलते-चलते उनके पैर वही ठिठक कर रुक गए।
एक साथी दूसरे साथी से पूछा, "यार, यहाँ पर आज इतनी भीड़ क्यों है?" कुछ देर तक दोनों साथी आपस में बतियाते हुए उस भीड़ को निहारते रहे। दूसरा दोस्त पहले वाले से बोला, "चल यार, देर हो रही हैं। कोई मर-वर गया होगा।”
इतना कहते-कहते दोनों साथी स्कूल की ओर चल दिए। तभी उनके पीछे से दो-तीन लड़कों की एक टोली उसी अन्दाज में वहीं उस भीड़ के पास आकर रुकी। फिर थोड़ा आगे जाकर खड़ी हो गई। सभी आपस में बातें करने लगे।
एक साथी दूसरे साथी से पूछा, "यार, यहाँ पर आज इतनी भीड़ क्यों है?" कुछ देर तक दोनों साथी आपस में बतियाते हुए उस भीड़ को निहारते रहे। दूसरा दोस्त पहले वाले से बोला, "चल यार, देर हो रही हैं। कोई मर-वर गया होगा।”
इतना कहते-कहते दोनों साथी स्कूल की ओर चल दिए। तभी उनके पीछे से दो-तीन लड़कों की एक टोली उसी अन्दाज में वहीं उस भीड़ के पास आकर रुकी। फिर थोड़ा आगे जाकर खड़ी हो गई। सभी आपस में बातें करने लगे।
उनमें से एक साथी बोला, "अबे मुझे पता हैं ये लोग क्यों ऐसे खड़े हैं। पता हैं... कल मेरे पापा के ही सामने यहां पर पुलिस आई थी और कुछ लोगो को यहां से पकड़ कर ले गई थी। इसलिए आज सब यहां चुप्पी मारे खड़े हैं।" इतना कहते हुए उस टोली के लड़के अपने स्कूल के रास्ते हो लिए।
इसी तरह से वहां से जो भी गुजरता उस चुप्पी का राज जानने की कोशिश करता। बाद में पता चला की वहां पर दो गुटों के लोगों में आपसी लड़ाई हुई थी। यहां से चार-पाँच लोगों को घायल हालात में लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में भी भर्ती कराया गया था। इसीलिए यहां अभी भी पुलिस तैनात हैं, ताकि फिर कोई फसाद न हो जाए।
इसी तरह से वहां से जो भी गुजरता उस चुप्पी का राज जानने की कोशिश करता। बाद में पता चला की वहां पर दो गुटों के लोगों में आपसी लड़ाई हुई थी। यहां से चार-पाँच लोगों को घायल हालात में लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में भी भर्ती कराया गया था। इसीलिए यहां अभी भी पुलिस तैनात हैं, ताकि फिर कोई फसाद न हो जाए।
मगर यहाँ अब पहले की अपेक्षा कम भीड़भाड़ है। फिर भी वहां से हर आता-जाता शख्स चुप्पी और लोगों के इकट्ठा होने का राज जानने की कोशिश करता है। मगर कोई भी उस खाक़ी वर्दी के सामने घटना की हक़ीकत के बारे में बताने को तैयार नहीं था।
यादों की एलबम
यादों की एलबम को खोलते ही नज़र पड़ी उस बीते वक्त पर जब हम यहां नए-नए आए थे। यहां नए दोस्तों की टोली में शामिल होना ख़ास था। एक साथ गली में हम कई खेल खेला करते और नए-नए खेल ईजाद भी कर लेते।
हम दोस्तों की टोली को कई आवाज़ों का इंतज़ार रहता। चूरन वाले भैया हो या फिर पापड़ और आइस्क्रीम वाले अंकल। घर का छोटा-मोटा काबाड़ निकाल, उनकी आवाज़ों का पीछा करते हुए उन तक पहुँच ही जाते।
हम दोस्तों की टोली को कई आवाज़ों का इंतज़ार रहता। चूरन वाले भैया हो या फिर पापड़ और आइस्क्रीम वाले अंकल। घर का छोटा-मोटा काबाड़ निकाल, उनकी आवाज़ों का पीछा करते हुए उन तक पहुँच ही जाते।
भोंपू-भोंपू... हाथों में पच्चीस पैसे लेकर हम आइस्क्रीम वाले के पास पहुंच जाते और जीभ से छुआते हुए हम उसका रस चूसते। जैसे-जैसे आइस्क्रीम का ठंडा रस गले को तर करता वैसे गले के अन्दर भी ठंडक का एहसास बढ़ता जाता। कोई नरियल वाली चुस्की लेता तो कोई आम और सन्तरे के स्वाद वाली।
आइसक्रीम खाने के बाद हम एक दूसरे को अपनी अपनी जीभ दिखाते फिरते। "देख तेरी जीभ काली हो गई हैं" और "तेरी सन्तरी", ये कहते हुए हम सभी साथी खूब हंसते और हाथों पर तालियाँ थापते।
पर आज ये सब पीछे छूट गया हैं क्योंकि वक्त के साथ हम बड़े हो चले हैं। लेकिन आज भी फुरसत के वक्त में हम अपने इस एल्बम की तस्वीरों के पन्ने को पलटकर एक-एक याद को गाहे-बगाहे ताजा कर लेते हैं।
Thursday, May 19, 2011
एक शख्सियत ऐसी भी
हँसी, जो उनके चेहरे पर इस उम्र में भी देखने लायक होती। उम्र कोई 75 साल। हट्टा-कट्ठा शरीर। गोल-मटोल चेहरे पर जवानों जैसी लालिमा और मुँह में इक्के-दुक्के दाँत।
गली-मोहल्ले में छोटे-बड़े किसी भी शख्स से दूर से हाथ खड़ा करके 'राम-राम जी' कहते हुए मिलते हैं और पहेली के अंदाज में यह कहते हुए जोर से हँस पड़ते हैं, "अभी तो जवान हूँ। पचास साल और जीउंगा। जवानी का खाया-पिया है, कब काम आएगा।" ये कहकर वो अपने जवान होने का एहसास कराते हैं।
सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद पत्नी की जगह काम पर जाते हैं और पत्नी को घर में ही अराम करने देते हैं। वहाँ भी वो जल्दी से काम करके दस बजे तक लौट आते हैं और नहा-धोकर जब गली में दाखिल होते हैं तो उनकी हँसी के ठहाकों की गूंज से पता चल जाता हैं नानाजी काम से लौट आए हैं।
गली में रिश्तों की सुलझन भी ऐसी कि गली-मोहल्ले में सभी छोटे-बड़े उन्हें नानाजी कहकर ही पुकारते हैं। नानाजी जहाँ पर भी बैठते हैं अपने ठहाकों की गूंज से अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। उनकी हँसी दूर-दूर तक सुनाई देती है।
घर में दाखिल होने से पहले वे एक बार ज़रूर खांसते हैं और 'नमस्ते' का जवाब 'राम-राम जी' कहते हुए बड़े आराम से देते हैं। जब वो अपनी बेटी के घर में दाखिल होते हैं तो उनके आने की आहट उस पर हल्के खांसने की आवाज़ ऊपर तक सुनाई देती है। बेटी के घर घुसने से पहले घर की चौखट को दो-तीन बार जरूर चूमते हैं। शायद वो बेटी के घर को लक्ष्मी मानते हुए ऐसा करते हैं।
उनकी शख्सियत ही ऐसी कि जितना खोलो उतना कम...।
रास्तों के दरमियां
तेज से किसी माहौल में घुसपैठ कऱती ये आवाजें जैसे आपको अपने काम के बीच से अपनी तरफ खींच ले जाती हैं। बिखरे हुए धुंधले अक्स का रूप लिए ये जैसे अपने बीच से अपनी ज़रूरतों के चुनाव को खोल देती हैं। चटाचट कानों में पड़ती इन ढेरों आवाज़ों को पता नहीं अनुसुना कर दिया जाता है या इनमें कुछ तलाश रहती हैं।
इस जगह लगता हैं लोग आँखों से कम कानों से ज़्यादा भांपते हैं। फिर इस भांपने के बाद किसी चुनाव में होते हैं। इस शोर में हर कोई अपने कानों को तेज किए हुए बस तलाशता रहता है और चुनाव हमेशा बचत की परख के परवान ही चढ़ता है। इतने शोर में लोग या तो खुद को ही सुन पाते हैं या लगातार पढ़ने वाली इन बोलियों को।
इनके पास, इनके बीच क्या चल रहा हैं- ये अभी बेख़बर हैं। इस जगह की ये भीड़ की शक्ल कुछ तो अख्तियार करती है जैसे हफ्ते का इंतज़ार, किसी की ज़रूरत, घर से बाहर निकलने का मौका या कुछ और शायद। शायद और भी बहुत कुछ। हम तो जैसे बस इस चहलकदमी में अपना वजूद लिए यूँ ही शामिल हो जाते हैं बाज़ार को मापने और आँकने के लिए।
ये सड़क हर हफ़्ते इन सभी चीज़ों के साथ रंगीन और रंगीन होती नज़र आती है। इन सातों दिनों के दरमियां इस दिन के सजावट तो तय हैं जो लोगों के शामिल होने और मौजूदगी पर खिलती और चहकती हैं। ये चहक भी लोगों की ड़िमांड पर होती है जैसे लगता है एक दिन कोई महफिल आवाज़ों से सजाई जाती है।
इस जगह में कहे गए हर शब्द के अपने-अपने मायने होते हैं, जहां दोनों हिस्सों की शुरुआत बाज़ार की छवि को हल्का करते हुए घर की चौखट तक लौट आती हैं।
Tuesday, March 15, 2011
गली की पहचान...
नज़रो को बड़ा कर जब वो किसी को देखते तो, गली के अन्दर क्या बहार क्या, जो जैसा खड़ा होता या बैठा होता वो वैसा का वैसा ही रह जाता। फिर किसी कि हिम्मत ना होती की ज़रा सा भी उससे कुछ पुछ ले। बस चेहरे पर एक सिकन्द सी छा जाती कि कही ज्यादा गुस्सा ना हो जाये ये शख्स।
6 नम्बर की उस गली में कदम रखा ही के चारो तरफ से घुरते हुए उस आवाज़ के झुन्ड़ ने झुन्झला सा दिया। अवाज़े ऐसी रोबदार के अच्छा खासा खड़े-खड़े ड़र से कापने लगे। फिर इस आवाज़ की गहराई चिल्ला-चिल्ला कर जैसे इस गली में अन्जानापन सा दर्ज कर जाती। उस आवाज़ का हर शब्द उस अन्जाने शख्स से जैसे उसके इस गली में आने कि वज़ह पुछती"क्योँ आये हो क्या करने आये हो”।
ना जाने उस आवाज़ ने कितनो को ड़राया होगा, यह कोई नही जानता। वो आवाज़ एसी कि उस आवाज़ के आगे बाकि आवाज़े आपना वजुद सा खो देती। फिर अक्सर इस थोड़ी देर के पल के बाद वही खड़े लोग या तो उस अन्ज़ान को समझाने लगते की यहाँ ध्यान से आया करो। यह हमारी गली के रखवाले हैं। या उस शख्स को प्यार से अपने पास बैठा, कुछ ड़राने वाले ठंग से इन रखवालो के किस्से सुनाने बैठ जाता। एक अजीब तरीके से जैसे सावधान भी करते, कि अगली बार कुत्ते वाली गली में ऐसे ही मत आ जाना। कही तुम्हे चोर समझ लिया तो...।
कई अवाज़ो में एक एसी आवाज़ होती हैं जो आपको बाकि जगहो से अपनी तरफ खीच लेती हैं। यह घुर्राने वाली आवाज़ भी इस गली को जैसे पहचान देती हैं। आस-पास के लोग इस गली को बखुबी ही पहचानते हैं। इन रखवालो के दिन भर के भौंकने की गुंज ने भी अपनी पहचान बनाई हुई हैं। लोग इन आवाजो कि गुंज में शामिल होकर किसी के साथ हुई किसी घटना का जिकर भी कर देते हैं।
Monday, February 7, 2011
याद हैं कुछ निशानियां...

कहीं भी, कभी भी सड़क पर भी आती-जाती तेज़ रफ़्तार गाड़ियो के बीच में जब कभी 611 और 306 नम्बर की बस नज़र आती हैं तो मुझे खिचड़ीपुर की याद आ जाती हैं।
बसों, उस पर छपे नम्बरों और नामों से एक अच्छी खासी तस्वीर उभरती हैं उस जगह की। खिचड़ीपुर के बनने और पनपने के बीच इन बसो ने भी अपना खासा रिश्ता अख्तियार किया है.
पर यह बात देखने लायक है कि आज भी खिचड़ीपुर जाने वाली सभी बसों में से किसी भी बस पर खिचड़ीपुर की नेम प्लेट नही हैं। सभी बसों पर कल्याणपुरी ही लिखा होता है।
यहाँ के लोगों को आज भी खिचड़ीपुर जाने के लिए कल्याणपुरी की नेमप्लेट लगी बस पर सवार होकर अपना सफ़र पूरा करना पड़ता हैं।
क्या बसों पर छपी उस जगह की कुछ निशानियां उस जगह की पहचान होती हैं?
- विक्की कोहली
पीं....!!!
क्या कहूँ, बचपन की इन चटपटी किस्से-कहानियों के बारे में? कभी कभी तो लगता हैं, मानो मैं उस जगह पर ही नहीं हूँ, जहां बचपन में अपने साथियों के साथ धमा-चौकड़ी किया करते थे। बरसात में गली से सीधा सड़क पर आकर ऊपर आकाश को ताकते हुए दोनों हाथो को फैलाकर ऐसा लगता जैसे हम आज़ाद पक्षी हों। जब मन होता अपने छोटे-बड़े हमजोली के साथ मन मुताबिक खेल खेलते और खूब मस्ती करते।
बाल्मीकि रोड, एक एसा शॉर्टकट रास्ता हैं, जो सभी को भाता हैं, चाहे राहगीर उस पर से कदम-ताल करते हुए निकले या गाड़ी चलाते हुए। इससे अच्छा शार्टकट और कोई नहीं उनके लिए।
यह रास्ता कई कॉलोनियों को भी जोड़ता हैं। फिर ख़ास बात यह हैं कि यहाँ न तो चौराहों पर चमचमाती हरी, लाल और पीली लाईटों का कोई संकेत और न ही किसी दिशा में मुड़ने का कोई निशान। जो जैसे चाहे, यहाँ के रास्ते पर चल सकता है।
फिर जब एक तरफ़ जब हमारे खेलों की कोई सीमा नहीं थी तो, गाड़ियों की कैसे होती। वो भी इस पर आ आज़ाद पक्षी हो लेते। हां बस ये नए आज़ाद पक्षी किसी को हंसाते नही बल्की हादसो दहशक में छोड़ देते हैं।
हादसे तो जैसे हमारे आये दिन के नये खेलो कि तरह बदलते रहते। कभी एक्सीडेन्ट से किसी का खुन बहना, कभी चिखती-चिल्लाती माँ अपने मासुम बच्चे को पुकारा करती। अब तो यही इस सडक का रंग और सांझा पन बन गया हैं।
ना जाने कहां गुम हो गई इस भीड़ में वो शान्त हमारी साँझी जगह। जहाँ के राजा हम साथी हुआ करते थे। वक्त के बदलाव में हमारी साँझी जगह हमारी ना रहकर भीड़-भाड़, डर, झिझक हेरानगी, हादसो, बेचैनी कि बनकर रह गई। बस पीछे छोड़ चली हैं, अपने वो निशान, जिसे देख आज भी हम कहते हैं क्या ये हमारा वही खेल का मैदान हुआ करता था।
मानो या ना मानो एसा लगता हैं जैसे ये सड़क, अपने उपर चल रहे इन बेड़ोल भारी-भरकम वाहनो को देखकर खुब करहाती हो, पर कभी कहती कुछ नही। जैसे पहले शान्त थी वैसे अब भी शान्त रहती हैं। बदलाव अपने में ही खास होते हैं बस फर्क हैं कि हम इन बदलावो को कैसे महसुस करते हैं। बदलाव में कुछ बनता हैं तो बहुत कुछ टुटता भी हैं।
बदलाव हमेशा सबको आज का आयना दिखाने कि कोशिश करता हैं, पर मेरी तरह कुछ लोग इसे देख अपना इतिहास दोहराने पर मजबुर रहते हैं। ये सड़क अपने में ही बड़ती, सिमटती,धीरे-धीरे सरकती, नए-नए अनुठे आकारो को जन्म देती रहती हैं।
सड़क सफ़र के बहाने मौका देती हैं, मंज़िल तक जा कर रास्तों को समझने का...
हर शहर में कभी हमारे आगे तो कभी पीछे सीधी लाईन सी खिसकती हुई दांय-बांया जाते हुए भुल-भुलया की तरह भटकने वाली चौराहो में बदल जाती हैं। हर किस्म के लोग इस पर कदम-ताल करते हुए महज़ एक राहगीर का किरदार निभा रहे हैं।
कहते हैं, हर चीज़, हर आकार, हर किस्से अपने में ही अजब-गज होते हैं। पर जब वो चीज़े समय की करवट के साथ तेज़ी से बदलते हैं तो देखने वाला भी दंग रह जाता हैं। बाते तो हज़ार होती हैं पर अपनी जगह को मन में हर दम बीते लम्हे कि तरह दोहराते हैं। जो बाते आम न रहकर बस हमारे जहन में याद बन समा जाती हैं।
क्या कहूँ, इन बातों को एक बुरा ख्वाब जो बक्त के लपेटे में उलझकर रह गई। सपना जो मुझे दिखता हैं पर किसी दुसरे को नही। या मेरे खुद के ही एसे अनुठे पल जो मुझे उस जगह पर पहुंच कर अक्सर इतिहास दोहराने पर बेबस कर देता हैं।
कहते हैं, हर चीज़, हर आकार, हर किस्से अपने में ही अजब-गज होते हैं। पर जब वो चीज़े समय की करवट के साथ तेज़ी से बदलते हैं तो देखने वाला भी दंग रह जाता हैं। बाते तो हज़ार होती हैं पर अपनी जगह को मन में हर दम बीते लम्हे कि तरह दोहराते हैं। जो बाते आम न रहकर बस हमारे जहन में याद बन समा जाती हैं।
क्या कहूँ, इन बातों को एक बुरा ख्वाब जो बक्त के लपेटे में उलझकर रह गई। सपना जो मुझे दिखता हैं पर किसी दुसरे को नही। या मेरे खुद के ही एसे अनुठे पल जो मुझे उस जगह पर पहुंच कर अक्सर इतिहास दोहराने पर बेबस कर देता हैं।
हमारे खेल का एक एसा मैदान जहां वक्त का कोई नियम नही। खेल की सीमा नही लखिरे थी। हर मौसम हर पल सड़क पर खेलते हुए भागते-दौड़ते हुए कटा। आज वो समय कही गुम हो गया हैं। आज वहां आकर खड़ा होना जैसे अपने में ये महसुस करना कि ये हमारी ही साँझी जगह हुआ करती थी। उस वक्त वो बड़ी ही शान्त स्वभाव की थी जहां हम सारे बीना ड़र झिझक के दांए-बांए।
एक छोर से दूसरे छोर तक आते-जाते खेलते रहते थे। सड़क वो क्या होती है? यह सड़क नही हमारी अपनी जगह हैं। जो हमारे रहने से ही चहकती हैं, रंग में घुलती हैं। हमने सड़क का दुसरा चेहरा ही देखा था पर हमारी जगह को इस भीड़-भाड़, गाड़ियों से भरी सुबह शाम पीं-पीं, टीर्न-टीर्न यातायात जैसे जमावड़े अगर हमारी आँखों के सामने और इनके तेज़ अलग-अलग किसम की आवाजें कानों में न पड़ती तो हम शायद सड़क शब्द से ही अन्जान रह जाते।
- शालू
कल्ब
Wednesday, February 2, 2011
पार्क...
अक्सर हम इस पार्क में कुछ ना कुछ खेला करते हैं। इस पार्क को बने तीस साल हो गये हैं। पार्क के चारो और से निकलने वाले लोग जब इस पार्क को देखते हैं, तो उनहे बहुत बुरा लगता हैं। लेकिन जब उस पार्क में बच्चो की आवाज़े सुनाई देती हैं तो लोग उस पार्क की तरफ तरफ मुड़-मुड़ कर देखा करते हैं। इस पार्क के इरद-गिरद जो ओर छोटे-छोटे पार्क हैं उन सब में से हमारे माहौल्ले का ही पार्क सबसे बड़ा हैं। यह बहुत ही हरा-भरा पार्क हैं, और इसकी खासियत ये है कि यह औरतो के लिये आपसी बातचीत करने और कुछ समय साथ बिताने कि एक जगह है, और आदमियों के लिये भी बैठने कि जगह बन गई हैं।
पर औरते घर से ज्यादा बाहर नही आती हैं क्योंकि उन्हे अपने काम से ही फुरसत नही मिलती हैं तो वो बात क्या करे। पर हमेशा गर्मीयों में वो पार्क की रेलिंग पर कपड़े सुखाती नज़र आ जाती हैं, इस बहाने इस बीच उनकी आपस में बाते भी हो जाती हैं। उनको कहते सुना हैं कि ये पार्क बना है तो कपड़े यहाँ आराम से सुख जाते है और बच्चो को भी घर के पास खेलने कि जगह मिल जाती हैं, और हमे बाते करने का मौका भी तो यहा मिल जाता है। सर्दियो में भी वो यहा अपने शरीर को धुप की गरमाहट देती हुई यहा गप्पे लड़ाती नजर आती हैं।
कभी कभी तो वे सभी वही पर बैठ के खाना भी खा लेती हैं। आदमी तो गर्मी हो या सर्दी वही बैठे नज़र आते हैं, गर्मी में धुप से बचने के लिये पेड़ की छाव में बैठे दिखाई देते है तो सर्दी में धुप कि किरणो को खुली हवा कि तरह अपने शरीर पर गिरने देते हैं। उनहे तो कोई मना भी नही करता की वो अपने अपने घरो से ज्यादा समय पार्क में गुजारते हैं।
लेकिन देखा हैं कि मौसम के अनुसार पार्क के अन्दर के पेड़ भी अपना रूप बदल लेते हैं। जैसे सावन के महीने में बारिश होने पर छोटी-छोटी, नन्ही-नन्ही घास उगने लग जाती हैं। फरवरी के महीने में पेड़ अंगडाईया लेता हुआ सारे पत्ते झाड़ देता हैं, इसके बाद नए पत्ते आने लगते हैं। पहले इस पार्क में एक बिजली घर भी था। जिससे पानी का एक पाईप जुड़ा हुआ था, जहां से पेड़ो में पानी दिया जाता था। कभी कभी लाईट ना होने पर या पानी ना आने पर लोग पीने का पानी भी यही से भरा करते हैं। और इससे भी बातो का एक छोटा सा माहौल बनना चालु हो जाता था।
सावन के महीने में तो नज़ारा बहुत रंगीन हो जाता हैं। बच्चे पेड़ो पर रस्सी से झुले डालकर दिन भर झुलते हैं। 5-6 साल पहले वो बिजली घर भी तोड़ दिया गया और उसकी जगह दुसरा नल लगा दिया। अब पार्क में टेन्ट भी लगने लगे हैं। जिन पेड़ो की ड़ालियो पर कभी सावन पर हमारे झुले हुआ करते थे वो ड़ालिया भी गल गई हैं। अगर अब हम वहा अपना झुला डालते भी हैं तो ड़ालिया भी टुट-टुट जाती हैं। एक समय इस पार्क कि मरमत के लिये सरकारी आर्डर भी आया कुछ लोग जो पार्क बनाने आये थे, उन लोगो ने पहले अपने रहने के लिये छोटी-छोटी झुग्गियाँ डाल ली। और पीर पार्क के मरमत के काम में लग गये। एक साल के अन्दर पार्क को बना दिया, चारो तरफ पटरिया बनाई गई, कुछ बेन्च बैठने के लिये बनाये गये, रेलिंग और पार्क कि दिवारो को भी ठिक किया गया। पार्क का काम हो जाने के बाद वो लोग वहा से चले गये। इसके बाद लोग यही पर अपने घर की शादियों के, जन्मदिन के और पार्टी के टेन्ट यहां लगाने लगे, तो सरकार ने इस पार्क में समान लाने ले जाने के लिये एक बड़ा गेट भी लगवा दिया। पर जिस समय वो गेट बनना चालु हुआ था तो शादियों का समय था। हमेशा ही यहां टेन्ट लगने की दिक्कत से गेट बनाने का काम कुछ समय के लिये रुक गया था पर आज आखिर वो गेट बनकर तैयार हो ही गया।
- सिमरन
क्लब
- सिमरन
क्लब
Friday, January 28, 2011
कदम दर कदम...
कदम दर कदम
दिल्ली शहर के पूर्व में एक विरान जगह जहाँ दुर दुर तक कोई परिंदा नज़र नही आता था। आज वही जगह खिचड़ीपुर के नाम से जानी जाती हैं। पहले चारो तरफ़ पेड़ पौधे और कांटो वाली बड़ी-बड़ी झाड़ीयां थी। जब हमे यहाँ पर बसाया गया तब हम यहाँ छोटा-सा आशियाना बनाकर रहने लगे और उसी में अपना समान रख दिया। रात को कोसो दुर हल्के से दिये की रोशनी दिखाई देती, वास्तव में वो दिया नही बल्फ जलता था। हमे तो बस यही लगता था कि कोई दिया टीमटीमा रहा हैं।
आस-पास लोगो ने भी धीरे-धीरे अपने आशियाने बनाने शुरू कर दिये। रात में तो हमे बहुत ड़र लगता था। जानवरो का डर रात भर जगाये रखता था। सभी के घर बनने की शुरवात में थे। कई घरो में तो अभी भी दरवाज़े नही लगे थे। एक दिन अफवाह उठी की भेड़ीया बकरी के बच्चो को उठा के ले गया। लोग जब अपने और अपने आस-पास के बच्चो की देख भाल बहुत किया करते थे।
आस-पास लोगो ने भी धीरे-धीरे अपने आशियाने बनाने शुरू कर दिये। रात में तो हमे बहुत ड़र लगता था। जानवरो का डर रात भर जगाये रखता था। सभी के घर बनने की शुरवात में थे। कई घरो में तो अभी भी दरवाज़े नही लगे थे। एक दिन अफवाह उठी की भेड़ीया बकरी के बच्चो को उठा के ले गया। लोग जब अपने और अपने आस-पास के बच्चो की देख भाल बहुत किया करते थे।
दिन तो जैसे-तैसे कट जाता था पर रात कटना मुश्किल होती था। रात होते ही सबको ड़र लगा रहता। शाम के 6-7 बजे से ही लोग अपने घर से बाहर निकलना बन्द कर देते। पहले यहाँ बिजली भी नही थी। लोग तार डालकर बिजल अपने घरो तक लाया करते थे। पानी भी लाईन लगाकर नलो से भरा जाता था। या पानी की तलाश में दुर दुर भटकना पड़ता था। आज हर घर में पानी की टंकिया हैं। उस वक्त पानी कि बहुत अहमियत थी, लेकिन अब तो पानी बहता हैं. तो बहने दो...। खिचड़ीपुर में आज धीरे-धीरे हर चीज़ की सुविधा हो गई हैं। लोग बाहर से आ-आकर खिचड़ीपुर में बसने लगे, अब तो पक्के मकान वो भी दो दो, तीन तीन मंजिल बन गये हैं। आज खिचड़ीपुर इतना मशहुर है की सब यहां के बारे में जानते हैं। पहले यहां एक ही रोड़ पर सभी गाड़ीया चलती थी, काफी काफी समय तक रोड़ पार करने के लिये खड़ होना पढ़ता था।
बसो की भी सुविधा कोई खास नही थी बस पकड़ने भी काफी आगे जाना पड़ता था। लोग बस के इन्तजार में पसीना -पसीना हो जाते थे। लेकिन अब एक नही काफी जगहो से सड़के निकाल दी हैं। अब भीड़-भाड़ तो होती हैं पर पहले की तरह नही और बस भी जल्दी मिल जाती हैं। अब खिचड़ीपुर ने अपना पुराना चेहरा बदल लिया हैं। आने वाले लोग तो कभी-कभी बदलावो के चलते पहचान ही नही पाते की कहां जाना हैं।
(फरजाना खान)
Introduction...
दिल्ली के छोर में बसे शहरों में से एक शहर खिचड़ीपुर भी हैं। खिचड़ीपुर सन् 1975-76 में बसना शुरु हुआ था। भौगोलोक दृष्टि से इसका आकार दिल्ली के नक्शे में किसी छोटे-से गमले के समान हैं। इसका एक किनारा कल्याण पुरी से सटा हुआ हैं तो दुसरा किनारा गाजीपुर से। खिचड़ीपुर के बांयी ओर एक बड़ा-सा नाला हैं, इसे गाजीपुर से अलग करता हैं। तो एक बड़ा सा पुल खिचड़ीपुर और गाजीपुर को आपस में जोड़ता भी हैं। जिसे देखना अपने में भव्य नज़ारा हैं।
कल्याणपुरी, विनोद नगर, मयूर विहार, त्रिलोक पुरी, शशि गार्डन आदि इसके आस-पास की बसी हुई कलोनियां हैं।
यहाँ के रहने वालो के अनुसार यह जगह जंगल जैसी हुआ करती थी, और ढेरो किकर के पेड़ और छः कुए भी हुआ करते थे। सरकार ने इस जगह को खरीदकर एक कलौनी का रूप दे दिया, जो आज खिचड़ीपुर के नाम से जाना जाती हैं। यहाँ पर बसने वाले लोग मूल रूप से उतर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और दिल्ली के आस-पास की जगहो से ही हैं।
इस जगह को चार मशहुर और अहम हिस्से मिलकर खिचड़ीपुर बनाते हैं, टी-कैम्प, इन्द्राकैम्प, खिचड़ीपुर गाँव और खिचड़ीपुर। इन्ही चारो जगहो का मिला जुला चहरा ही खिचड़ीपुर हैं। इन ठिकानो की अपनी अपनी विशेशता भी हैं, जैसे इन्द्राकैम्प में दाखिल होने और निकलने के लिये 16 गलियां हैं। इसलिये लोग इसे 16 गलियो वाली जगह के नाम से भी पुकारते हैं। तो टी-कैम्प की बनावट और वहां की गलियां और घर बहुत ही छोटे हैं, और आमने -सामने के घरो का बंटवारा छोटी छोटी नालियों ने कर रखा हैं। घर12 गज़ के हैं, तो गलियां तंग गलियों का सफ़र लगती हैं। जहाँ से एक साईकिल को भी नही निकाला जा सकता। यह कलौनी सन् 1986 में बसी थी और यहाँ ए से पी तक ब्लॉक हैं, और एक तरफ 252 घर हैं तो दुसरी तरफ 234 घर हैं ये 486 आशियाने मिलकर टी-कैम्प बनाते हैं। खिचड़ीपुर गाँव तो, आज भी अपना अलग वजुद लिये जी रहा हैं। यह जगह गाँव की झलक लिये हुये हैं, यहाँ का पहनावा गाँव के पहनावे की तरह हैं, आस पास की जगहों में तबैले और उपले दिखाई देते हैं, और निगाहो के सामने बड़ी-बड़ी पुशतैनी हवैलियां हैं, और लोगो की सवारियां भी ट्रैक्टर हैं। इस जगह ने भी शहर के साथ तब्दिलियां की पर अपना तस्विर नही बदला। इसके अलावा खीचड़ीपुर में एक से दस तक ब्लॉक हैं और हर ब्लॉक के आशियानो की संख्या पाँच-सौ से छः-सौ के आस-पास हैं।
यह जगह अपने परिवेश का एक जीवंत उदाहरण हैं। आज भी इन्द्राकैम्प की सोलह गलियों के भीतर बने घरो के बाहर मिट्टी के बने हुए चुल्हे गांव की झलक ले आते हैं। तो वही दोपहर के समय छुट्टी के बाद स्कुल से निकलते ढेरो साथी आने वाली तस्वीर का रूप भी लिये रहते हैं। त्यौहारो का उल्लास, उत्सव तो देखने लायक होता हैं। शादी विवाह जैसे अवसरों पर परम्पराओ और रीतियों की हर कड़ी साफ़ तौर पर दिखती हैं।
अपने हुनर और खासियतो के चलते इस जगह में गति रहती हैं। यह गति हर रात को सवेरे के इन्तेजार में तैयारी करती हैं। यहाँ के लोगो के लिये हर सुबह के मायने अलग जो रहते हैं।
ये तो अभी शुरूवात थी खिचड़ीपुर को जानने की। हम खिचड़ीपुर के एसे ही कई मजेदार किस्से कहांनियो के साथ एसे ही बने रहेंगे। तो देखते हैं खिचड़ीपुर पहले, आज और कल...
Subscribe to:
Posts (Atom)



